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Ashok Chakradhar

A Poem by Ashok Chakradhar : Thekedar Bhag Liya , ठेकेदार भाग लिया

‫ ‫ Thekedar Bhag Liya ठेकेदार भाग लिया फावड़े ने मिट्टी काटने से इंकार कर दिया और बदरपुर पर जा बैठा एक ओर ऐसे में तसले की मिट्टी ढोना कैसे गवारा होता ? काम छोड़ आ गया फावड़े की बगल ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Tera Hai , तेरा है

‫ ‫ Tera Hai तेरा है तू गर दरिन्दा है तो ये मसान तेरा है, अगर परिन्दा है तो आसमान तेरा है। तबाहियां तो किसी और की तलाश में थीं कहां पता था उन्हें ये मकान तेरा है। छलकने मत ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Tamasha तमाशा

‫ ‫ Tamasha तमाशा अब मैं आपको कोई कविता नहीं सुनाता एक तमाशा दिखाता हूँ, और आपके सामने एक मजमा लगाता हूँ। ये तमाशा कविता से बहूत दूर है, दिखाऊँ साब, मंजूर है? कविता सुनने वालो ये मत कहना कि ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Subichar , सुविचार

‫ ‫ Subichar सुविचार मन में इसी सुविचार का सुविचार हो सन चार में बस प्यार का संचार हो जनतंत्र के जज़्बात को जीमें नहीं जोगी की या जुदेव की नाराज़गियाँ नभ में कबूतर तो दिलेरी से उड़ें ना हो ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : So To Hai Khacera , सो तो है खचेरा

‫ ‫ So To Hai Khacera सो तो है खचेरा गरीबी है- सो तो है, भुखमरी है – सो तो है, होतीलाल की हालत खस्ता है – सो तो खस्ता है, उनके पास कोई रस्ता नहीं है – सो तो ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : So To Hai Khacera , सो तो है खचेरा

‫ ‫ So To Hai Khacera सो तो है खचेरा गरीबी है- सो तो है, भुखमरी है – सो तो है, होतीलाल की हालत खस्ता है – सो तो खस्ता है, उनके पास कोई रस्ता नहीं है – सो तो ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Pol-Kholak Yantra , पोल-खोलक यंत्र

‫ ‫ Pol-Kholak Yantra पोल-खोलक यंत्र ठोकर खाकर हमने जैसे ही यंत्र को उठाया, मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुई कुछ घरघराया। झटके से गरदन घुमाई, पत्नी को देखा अब यंत्र से पत्नी की आवाज़ आई- मैं तो भर पाई! ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Phir Kabhi , फिर कभी

‫ ‫ Phir Kabhi फिर कभी एक गुमसुम मैना है अकेले में गाती है राग बागेश्री । तोता उससे कहे कुछ सुनाओ तो ज़रा तो चोंच चढ़ाकर कहती है फिर कभी गाऊँगी जी ।   Ashok Chakradhar

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A Poem by Ashok Chakradhar : Pahle Pahle , पहले पहले

‫ ‫ Pahle Pahle पहले पहले मुझे याद है वह जज़्बाती शुरुआत की पहली मुलाक़ात जब सोते हुए उसके बाल अंगुल भर दूर थे लेकिन उन दिनों मेरे हाथ कितने मज़बूर थे ?   Ashok Chakradhar

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A Poem by Ashok Chakradhar : Nanhi Sachai , नन्ही सचाई

‫ ‫ Nanhi Sachai नन्ही सचाई एक डॉक्टर मित्र हमारे स्वर्ग सिधारे। असमय मर गए, सांत्वना देने हम उनके घर गए। उनकी नन्ही-सी बिटिया भोली-नादान थी, जीवन-मृत्यु से अनजान थी। हमेशा की तरह द्वार पर आई, देखकर मुस्कुराई। उसकी नन्ही-सचाई ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Nakhredar , नख़रेदार

‫ ‫ Nakhredar नख़रेदार भूख लगी है चलो, कहीं कुछ खाएं । देखता रहा उसको खाते हुए लगती है कैसी, देखती रही मुझको खाते हुए लगता हूँ कैसा । नख़रेदार पानी पिया नख़रेदार सिगरेट ढाई घंटे बैठ वहाँ बाहर निकल ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Masho ki Ma , माशो की माँ

‫ ‫ Masho ki Ma माशो की माँ नुक्कड़ पर माशो की माँ बेचती है टमाटर । चेहरे पर जितनी झुर्रियाँ हैं झल्ली में उतने ही टमाटर हैं । टमाटर नहीं हैं वो सेव हैं, सेव भी नहीं हीरे-मोती हैं ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Krom , क्रम

‫ ‫ Krom क्रम एक अंकुर फूटा पेड़ की जड़ के पास । एक किल्ला फूटा फुनगी पर । अंकुर बढ़ा जवान हुआ, किल्ला पत्ता बना सूख गया । गिरा उस अंकुर की जवानी की गोद में गिरने का ग़म ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Kitni Roti , कितनी रोटी

‫ ‫ Kitni Roti कितनी रोटी गांव में अकाल था, बुरा हाल था। एक बुढ़ऊ ने समय बिताने को, यों ही पूछा मन बहलाने को— ख़ाली पेट पर कितनी रोटी खा सकते हो गंगानाथ ? गंगानाथ बोला— सात ! बुढ़ऊ ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Kidhar Gai Bate , किधर गई बातें

‫ ‫ Kidhar Gai Bate किधर गई बातें चलती रहीं चलती रहीं चलती रहीं बातें यहाँ की, वहाँ की इधर की, उधर की इसकी, उसकी जने किस-किस की, कि एकएक सिर्फ़ उसकी आँखों को देखा मैंने उसने देखा मेरा देखना ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Kaun Hai Ye Jaini? कौन है ये जैनी

‫ ‫ Kaun Hai Ye Jaini? कौन है ये जैनी? बीवी की नज़र थी बड़ी पैनी- क्यों जी, कौन है ये जैनी? सहज उत्तर था मियाँ का- जैनी, जैनी नाम है एक कुतिया का। तुम चाहती थीं न एक डौगी ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Kam Se Kam , कम से कम

‫ ‫ Kam Se Kam कम से कम एक घुटे हुए नेता ने छंटे हुए शब्दों में भावुक तकरीर दी, भीड़ भावनाओं से चीर दी। फिर मानव कल्याण के लिए दिल खोल दान के लिए अपनी टोपी घुमवाई, पर अफ़सोस ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : जंगल गाथा , Jangal Gatha

‫ ‫ Jangal Gatha ‫ जंगल गाथा पानी से निकलकर मगरमच्छ किनारे पर आया, इशारे से बंदर को बुलाया. बंदर गुर्राया- खों खों, क्यों, तुम्हारी नजर में तो मेरा कलेजा है? मगर्मच्छ बोला- नहीं नहीं, तुम्हारी भाभी ने खास तुम्हारे ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Gati Ka Kusur , गति का कुसूर

‫ ‫ Gati Ka Kusur ‫ गति का कुसूर क्या होता है कार में- पास की चीज़ें पीछे दौड़ जाती है तेज़ रफ़तार में! और ये शायद गति का ही कुसूर है कि वही चीज़ देर तक साथ रहती है ...

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A Poem by Ashok Chakradhar : Garibdash ka Shunyo गरीबदास का शून्य

‫ ‫ Garibdash ka Shunyo गरीबदास का शून्य घास काटकर नहर के पास, कुछ उदास-उदास सा चला जा रहा था गरीबदास। कि क्या हुआ अनायास… दिखाई दिए सामने दो मुस्टंडे, जो अमीरों के लिए शरीफ़ थे पर ग़रीबों के लिए ...

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