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Umbilical herniation – नाभि का खिसकना

Umbilical herniation

Umbilical herniation

– Total number of vessels more than seventy-two thousand Nabhisthan source is described and its original source .

– Modern style of life is such that shine with the stress – pressure -filled competitive environment to live and work in the person’s navel chakra remains constant irritant . The navel is disorganized . Also soaring during play – jump , absently right – left bending , lifting heavy load with both hands or one hand suddenly , rapidly climbing stairs – landing , walking down the street potholes , sudden leg or other reasons to leave impact or shock load on one leg navel around it. Some navel disorder in childhood are several reasons .

– Takes the morning in empty stomach Shavasana on the ground . From the navel to feel the vibrations in the knuckle of the thumb . If this is correct only in the navel . Many times it is a little away from the navel to feel vibrations ; Is called the navel parry or dodge . The experience that usually men and women navel belly button to the left to the right is cleared .

– Navel disorder lasts longer than the person’s teeth, stomach disorders , adverse effects on the health of the eyes and the hair . Dental natural brightness decreases . There is an occasional pain in the teeth . Eyes to the beauty and the light begins to fade . Seem to be premature white hair . Laziness , fatigue , irritability , loss of interest in work , anxiety , depression , negative trends such as the presence of unreasonable fear of the Navel chakra is to produce chaos .

– Navel vibration diagnosis refer to our Ayurveda and natural healing therapies alone. But unfortunately not to say that we can handle our valuable heritage . Pulsation of the umbilical moving upwards ie Agnyashy side of the chest seems to be bad . This has disastrous effects on the lungs . Diabetes , asthma , bronchitis , diseases like start.

– If the vibrations if the stools seem to be headed .

– From moving to the left seems to be a lack of cold , catarrh , cough , Kfjnit disease early – quick .

– On the right to withdraw, lack of appetite and liver damage may occur. Pittadiky , acid , burning, etc. , there are complaints . The sun cycle becomes ineffective . Summer – Winter will be out of balance in the body . Lack of appetite , indigestion , diseases like chaos starts .

– The navel to the spine opposite the stomach upwards to come , so is obesity . Air disorder is . The navel downwards ( towards the spine ) to go away if the person eats something , he would run lean . Awanadyatmik navel mental capabilities are reduced from moving .

– The navel is called Hades . Adds six minutes to live after death, life is in the navel .

– Between the navel right on the middle level are eligible pregnant women . That shifted from the middle class goes down the side of the spine Such women can not conceive .

– Often just below the navel to the spine moves into the fallopian tube opened and the reason women can not conceive . Many women use on Wandya navel was brought to the middle level . This Wandya pregnant women were eligible . In some cases treatment had been running for years and was told by doctors that it can not conceive , but the navel – The Cure pundits treated .

– Merge the two palms . After the line between the palm or the finger and small finger of the left hand side is smaller then the left arm above the elbow to the hand holding it. Mutti then tightly on the left hand side to bring hand tremors . Do this 8-10 times . This will set the navel .

– पादांगुष्ठनासास्पर्शासन Uttanpadasn , Naucasn , Kndhrasn , Ckrasn , Dhanurasana yoga etc., may come from the navel to the right place .

– 15 to 25 min. Would benefit from air exchange .

– Two teaspoons ground fennel , mixed Ghud a week from their place of habitual movement stops eating navel .

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नाभि का खिसकना

– योग में नाड़ियों की संख्या बहत्तर हजार से ज्यादा बताई गई है और इसका मूल उदगम स्त्रोत नाभिस्थान है।

– आधुनिक जीवन-शैली इस प्रकार की है कि भाग-दौड़ के साथ तनाव-दबाव भरे प्रतिस्पर्धापूर्ण वातावरण में काम करते रहने से व्यक्ति का नाभि चक्र निरंतर क्षुब्ध बना रहता है। इससे नाभि अव्यवस्थित हो जाती है। इसके अलावा खेलने के दौरान उछलने-कूदने, असावधानी से दाएँ-बाएँ झुकने, दोनों हाथों से या एक हाथ से अचानक भारी बोझ उठाने, तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने, सड़क पर चलते हुए गड्ढे, में अचानक पैर चले जाने या अन्य कारणों से किसी एक पैर पर भार पड़ने या झटका लगने से नाभि इधर-उधर हो जाती है। कुछ लोगों की नाभि अनेक कारणों से बचपन में ही विकारग्रस्त हो जाती है।

– प्रातः खाली पेट ज़मीन पर शवासन में लेतें . फिर अंगूठे के पोर से नाभि में स्पंदन को महसूस करे . अगर यह नाभि में ही है तो सही है . कई बार यह स्पंदन नाभि से थोड़ा हट कर महसूस होता है ; जिसे नाभि टलना या खिसकना कहते है .यह अनुभव है कि आमतौर पर पुरुषों की नाभि बाईं ओर तथा स्त्रियों की नाभि दाईं ओर टला करती है।

– नाभि में लंबे समय तक अव्यवस्था चलती रहती है तो उदर विकार के अलावा व्यक्ति के दाँतों, नेत्रों व बालों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। दाँतों की स्वाभाविक चमक कम होने लगती है। यदाकदा दाँतों में पीड़ा होने लगती है। नेत्रों की सुंदरता व ज्योति क्षीण होने लगती है। बाल असमय सफेद होने लगते हैं।आलस्य, थकान, चिड़चिड़ाहट, काम में मन न लगना, दुश्चिंता, निराशा, अकारण भय जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों की उपस्थिति नाभि चक्र की अव्यवस्था की उपज होती है।

– नाभि स्पंदन से रोग की पहचान का उल्लेख हमें हमारे आयुर्वेद व प्राकृतिक उपचार चिकित्सा पद्धतियों में मिल जाता है। परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम हमारी अमूल्य धरोहर को न संभाल सके। यदि नाभि का स्पंदन ऊपर की तरफ चल रहा है याने छाती की तरफ तो अग्न्याष्य खराब होने लगता है। इससे फेफड़ों पर गलत प्रभाव होता है। मधुमेह, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं।

– यदि यह स्पंदन नीचे की तरफ चली जाए तो पतले दस्त होने लगते हैं।

– बाईं ओर खिसकने से शीतलता की कमी होने लगती है, सर्दी-जुकाम, खाँसी, कफजनित रोग जल्दी-जल्दी होते हैं।

– दाहिनी तरफ हटने पर लीवर खराब होकर मंदाग्नि हो सकती है। पित्ताधिक्य, एसिड, जलन आदि की शिकायतें होने लगती हैं। इससे सूर्य चक्र निष्प्रभावी हो जाता है। गर्मी-सर्दी का संतुलन शरीर में बिगड़ जाता है। मंदाग्नि, अपच, अफरा जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं।

– यदि नाभि पेट के ऊपर की तरफ आ जाए यानी रीढ़ के विपरीत, तो मोटापा हो जाता है। वायु विकार हो जाता है। यदि नाभि नीचे की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) चली जाए तो व्यक्ति कुछ भी खाए, वह दुबला होता चला जाएगा। नाभि के खिसकने से मानसिक एवंआध्यात्मिक क्षमताएँ कम हो जाती हैं।

– नाभि को पाताल लोक भी कहा गया है। कहते हैं मृत्यु के बाद भी प्राण नाभि में छः मिनट तक रहते है।

– यदि नाभि ठीक मध्यमा स्तर के बीच में चलती है तब स्त्रियाँ गर्भधारण योग्य होती हैं। यदि यही मध्यमा स्तर से खिसककर नीचे रीढ़ की तरफ चली जाए तो ऐसी स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर सकतीं।

– अकसर यदि नाभि बिलकुल नीचे रीढ़ की तरफ चली जाती है तो फैलोपियन ट्यूब नहीं खुलती और इस कारण स्त्रियाँ गर्भधारण नहीं कर सकतीं। कई वंध्या स्त्रियों पर प्रयोग कर नाभि को मध्यमा स्तर पर लाया गया। इससे वंध्या स्त्रियाँ भी गर्भधारण योग्य हो गईं। कुछ मामलों में उपचार वर्षों से चल रहा था एवं चिकित्सकों ने यह कह दिया था कि यह गर्भधारण नहीं कर सकती किन्तु नाभि-चिकित्सा के जानकारों ने इलाज किया।

– दोनों हथेलियों को आपस में मिलाएं। हथेली के बीच की रेखा मिलने के बाद जो उंगली छोटी हो यानी कि बाएं हाथ की उंगली छोटी है तो बायीं हाथ को कोहनी से ऊपर दाएं हाथ से पकड़ लें। इसके बाद बाएं हाथ की मुट्ठि को कसकर बंद कर हाथ को झटके से कंधे की ओर लाएं। ऐसा ८-१० बार करें। इससे नाभि सेट हो जाएगी।

– पादांगुष्ठनासास्पर्शासन उत्तानपादासन , नौकासन , कन्धरासन , चक्रासन , धनुरासन आदि योगासनों से नाभि सही जगह आ सकती है .

– 15 से 25 मि .वायु मुद्रा करने से भी लाभ होता है .

– दो चम्मच पिसी सौंफ, ग़ुड में मिलाकर एक सप्ताह तक रोज खाने से नाभि का अपनी जगह से खिसकना रुक जाता है।

  Story Source: पूज्य आचार्य

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