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सलां दी मुक गई राखी, ओ जट्टा आई वसाखी – The mutism was a thread Salins, O jatta I vasakhi

The mutism was a thread Salins, O jatta I vasakhi

सलां दी मुक गई राखी, ओ जट्टा आई वसाखी

वैशाखी, भारत में पंजाब राज्य में सिक्ख समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है। देश विदेश में वैशाखी के अवसर पर, विशेषकर पंजाब में मेले लगते हैं। लोग सुबह-सुबह सरोवरों और नदियों में स्नान कर मंदिरों और गुरुद्वारों में जाते हैं। लंगर लगाये जाते हैं और चारों तरफ लोग प्रसन्न दिखलायी देते हैं। विशेषकर किसान,गेहूँ की फ़सल को देखकर उनका मन नाचने लगता है। गेहूँ को पंजाबी किसान ‘कनक’ यानि सोना मानते हैं। यह फ़सल किसान के लिए सोना ही होती है, उसकी मेहनत का रंग दिखायी देता है। वैशाखी पर गेहूँ की कटाई शुरू हो जाती है। वैशाखी पर्व ‘बंगाल में पैला (पीला) बैसाख’ नाम से, दक्षिण में ‘बिशु’ नाम से और ‘केरल, तमिलनाडु,असम में बिहू’ के नाम से मनाया जाता है।

सिखों के दसवें गुरू गोबिन्द सिंह ने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की नींव रखी और इस तरह फसल कटने के उल्लास में मनाए जाने वाले इस पावन दिन पर खुश होने की दो वजह हो गईं। बैसाखी पर्व दरअसल एक लोक त्योहार है जिसमें फसल पकने के बाद उसके कटने की तैयारी का उल्लास साफ झलकता है।

पंजाब और हरियाणा सहित कई क्षेत्रों में बैसाखी मनाने के आध्यात्मिक सहित तमाम कारण हैं। सिख धर्म के विशेषज्ञों के अनुसार पंथ के प्रथम गुरू बाबा नानक देव ने वैशाख माह की आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से काफी प्रशंसा की है।

देश के अधिकांश भागों में हालाँकि गर्मी का प्रकोप शुरू हो चुका है, लेकिन बैसाखी को जाड़ा खत्म होने और गर्मी की शुरूआत के रूप में मनाया जाता है, जब खेतों में फसल पककर सुनहरी हो जाती है और नए पत्तों से सजे पेड़-पौधे हरी चादर ओढ़ लेते हैं।

लोकजीवन में बैसाखी फसल पकने का त्योहार है। फसल पकने को ग्रामीण जीवन की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। बैसाखी के दिन ही दशम गुरू गोबिन्द सिंह ने आनंदपुर साहिब में वर्ष 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी। 

इस दिन उन्होंने खालसा पंथ पर जान न्यौछावर करने के लिए अपने अनुयायियों को आगे आने को कहा था। लेकिन जब गुरु के लिए सिर देने की बात आई तो केवल पाँच शिष्य ही सामने आए। इन्हीं पाँचों शिष्यों को पंज प्यारा कहा गया। गुरु गोबिन्द सिंह ने इन पंज प्यारों को अमृत छका कर अपना शिष्य बनाया और खालसा पंथ की स्थापना की थी। 

खालसा पंथ की स्थापना के दिन गुरु गोबिन्द सिंह ने पहले अपने शिष्यों को अमृत छकाया और फिर स्वयं उनके हाथों से अमृत छका। इसीलिए कहा गया है… ‘प्रगट्यो मर्द अगमण वरियाम अकेला, वाह वाह गुरु गोबिन्द आपै गुरु आपै चेला।’ उन्होंने कहा कि चूँकि खालसा की स्थापना के दिन गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों को अमृत छकाया था, लिहाजा बैसाखी के दिन कुछ लोग उसी घटना की याद में अमृत छकते हैं। वैसे खालसा पंथ में साल के अन्य दिनों भी अमृत छका जाता है कि लेकिन इस मामले में बैसाखी का दिन सबसे विशिष्ट होता है।

सिख धर्म में बैसाखी का आध्यात्मिक महत्व है। जीवन में हमेशा नेकी और बदी की लड़ाई चलती रहती है। बैसाखी के दिन गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों को बुराई से दूर करते हुए नेकी की राह पर चलने की शिक्षा दी थी।

खालसा पंथ में शामिल होने का आध्यात्मिक अर्थ ही नेकी की राह पर चलते हुए एक नए जीवन की शुरूआत करना है। बैसाखी पर्व पर आनंदपुर गुरुद्वारे में विशिष्ट आयोजन किया जाता है। देश के अन्य गुरुद्वारों में इस दिन अखंड पाठ का आयोजन होता है। कड़ाह प्रसाद वितरित किया जाता है और अमृत छकाया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिन्दू पंचांग के अनुसार गुरु गोबिन्द सिंह ने वैशाख माह की षष्ठी तिथि के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन चूँकि मकर संक्रांति भी थी, लिहाजा यह बैसाखी का पर्व सूर्य की तिथि के अनुसार मनाया जाने लगा। 

उन्होंने कहा कि सूर्य मेष राशि में प्राय: 13 या 14 अप्रैल को प्रवेश करता है, इसीलिए बैसाखी भी इसी दिन मनाई जाती है। बैसाखी का भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी विशिष्ट स्थान है। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के समीप 13 अप्रैल 1919 में हजारों लोग जलियाँवाला बाग में एकत्र हुए थे। लोगों की भीड़ अंग्रेजी शासन के रालेट एक्ट के विरोध में एकत्र हुई थी।

जलियाँवाला बाग में जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ बरसाईं जिसमें करीब 1000 लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए। अंग्रेजी सरकार के इस नृशंस कृत्य की पूरे देश में कड़ी निंदा की गई और इसने देश के स्वाधीनता आंदोलन को एक नई गति प्रदान कर दी।

जलियाँवाला बाग की घटना ने बैसाखी पर्व को एक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर दिया। आज भी लोग जहाँ इस पर्व को पारंपरिक श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं वहीं वे जलियाँवाला बाग कांड में शहीद हुए लोगों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना भी नहीं भूलते।

Credit : Acharya Bal Krishan

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The mutism was a thread Salins, O jatta I vasakhi
Vaishakh, in the state of Punjab in India by Sikh community celebrated as a major festival. In a foreign country Vaishakh On the occasion of the fair, particularly in Punjab do. The morning – early morning dip in the rivers and sarovarom in the temples and Gurdwaras are. They are worn around the anchor and are happy dikhalayi. In particular, the farmers, the wheat crop at their mind dances. Punjabi wheat farmers ‘Kanaka’, that is considered the gold. It is the gold leaf to the farmer, the color of his efforts demonstrates. Vaishakh on wheat harvesting has begun. Vaishakh festival in Bengal in the paella (yellow) crutch ‘names in the South’ Vishu ‘and the name’ Kerala, Tamil Nadu, Bihu in Assam, the name ‘is celebrated.

Sikhs, Guru Govind Singh, the tenth day of Baisakhi harvest, and thus laid the foundation of Khalsa Panth In celebration of this auspicious day is celebrated two very good reasons to be happy to be over. In fact, the festival of Baisakhi is a festival in which people cut the crop ripened, after the preparation of the joy was obvious.

Punjab and Haryana celebrate Baisakhi in many areas, including all of the spiritual reasons. Sikh religion Baba Guru Nanak Dev, the first of experts cult of the month, the Vaishakh praised by spiritual Sadhana.

In most parts of the country, an outbreak has begun to heat, but the winter is over, crutches and is celebrated in the beginning of the summer, meats and golden crop farms are decorated with leaves and new vegetation green sheet Let’s wear.

The harvest festival of Baisakhi in lokajivana to cook. The ripening of crops have been linked to the prosperity of rural life. Guru Govind Singh, the tenth day of Baisakhi at Anandpur Sahib Khalsa Panth was established in the year 1699.

Khalsa Panth on this day, dedicated to the life of his followers had asked to come forward. But when it came to the guru’s head there are only five disciples came up. Five Panj these students were called love. Guru Govind Singh and the Panj loved ones chaka nectar and made his disciple, founded the Khalsa Panth.

Guru Govind Singh, the first day of the establishment of the Khalsa Panth to his disciples chakaya nectar nectar from his hands, and yourself chaka. So much has been said … ‘pragatyo the man agamana variyama alone, hey guru, Guru Govind apai apai disciple.’ He said, Guru Govind Singh, the day of the establishment of the Khalsa Amrit chakaya his disciples, so some of Baisakhi day In memory of the event is the nectar chakate. By the way, on other days of the year in nectar chaka Khalsa Panth is the day of Baisakhi in this case is unique.

In the Sikh religion is the spiritual significance of the crutch. There’s always a good battle of life and evilly. Guru Govind Singh, the day of Baisakhi his disciples away from evil and do good and was taught to walk on the path.

Khalsa Panth to be involved in the spiritual sense by adhering to the path of righteousness is the introduction of a new life. Gurdwara in Anandpur on Baisakhi festival in the specific host. The complete text of the day Gurudwaras in the country are held. Caldron is distributed and Amrit Prasad is chakaya. Experts believe that Guru Govind Singh, the Hindu almanac, according to the task Vaishakh month of the date of the day was the founder of Khalsa Panth. It was also the same day as the Winter Solstice, the sun, therefore the clutch to the date of the festival being celebrated.

He said that the Sun in Aries often enters on April 13 or 14, which is why this day is celebrated as a crutch. Indian freedom struggle is in the unique position of the crutch. Golden Temple in Amritsar, close to Jallianwala Bagh on April 13, 1919, thousands of people had gathered in. A crowd had gathered to protest against the British Raj, raleta Act.

General Dyer, an unarmed crowd barasaim fire at Jallianwala Bagh in which about 1000 people were killed and more than 2,000 injured. This brutal act of the British government in the country and condemned the country’s independence movement has provided a new momentum.

Baisakhi festival in the event of a national Jallianwala Bagh has been provided. While the event is still celebrated with the traditional doctrine of happiness and also to express appreciation to the people who died in the incidents of Jallianwala Bagh not want to forget.

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