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A Poem by Ashok Chakradhar : Kidhar Gai Bate , किधर गई बातें

Ashok Chakradhar -1

Kidhar Gai Bate

किधर गई बातें

चलती रहीं
चलती रहीं
चलती रहीं बातें
यहाँ की, वहाँ की
इधर की, उधर की
इसकी, उसकी
जने किस-किस की,
कि
एकएक
सिर्फ़ उसकी आँखों को देखा मैंने
उसने देखा मेरा देखना ।
और… तो फिर…

किधर गईं बातें,
कहाँ गईं बातें ?

 

 

Ashok Chakradhar

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