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Reason for the rebound – खुशहाली का कारण

Reason for the rebound

खुशहाली का कारण

जापान के टोक्यो शहर के निकट एक कस्बा अपनी खुशहाली के लिए प्रसिद्ध था | एक बार एक व्यक्ति उस कसबे की खुशहाली का कारण जानने के लिए सुबह -सुबह वहाँ पहुंचा | कस्बे में घुसते ही उसे एक कॉफ़ी -शॉप दिखायी दी।उसने मन ही मन सोचा कि मैं यहाँ बैठ कर चुप -चाप लोगों को देखता हूँ , और वह धीरे – धीरे आगे बढ़ते हुए शॉप के अंदर लगी एक कुर्सी पर जा कर बैठ गया |
कॉफ़ी-शॉप शहर के रेस्टोरेंटस की तरह ही थी ,पर वहाँ उसे लोगों का व्यवहार कुछ अजीब लगा |
एक आदमी शॉप में आया और उसने दो कॉफ़ी के पैसे देते हुए कहा , “ दो कप कॉफ़ी , एक मेरे लिए और एक उस दीवार पर। ”
व्यक्ति दीवार की तरफ देखनेलगा लेकिन उसे वहाँ कोई नज़र नहीं आया ,पर फिर भी उस आदमी को कॉफ़ी देने के बाद वेटर दीवार के पास गया और उस पर कागज़ का एक टुकड़ा चिपका दिया , जिसपर “एक कप कॉफ़ी ” लिखा था |
व्यक्ति समझ नहीं पाया कि आखिर माजरा क्या है . उसने सोचा कि कुछ देर और बैठता हूँ ,और समझने की कोशिश करता हूँ |
थोड़ी देर बाद एक गरीब मजदूर वहाँ आया , उसके कपड़े फटे -पुराने थे पर फिर भी वह पुरे आत्म -विश्वास के साथ शॉप में घुसा और आराम से एक कुर्सी पर बैठ गया |
व्यक्ति सोच रहा था कि एक मजदूर के लिए कॉफ़ी पर इतने पैसे बर्वाद करना कोई समझदारी नहीं है …
तभी वेटर मजदूर के पास आर्डर लेने पंहुचा .“ सर , आपका आर्डर प्लीज !”, वेटर बोला |
“ दीवार से एक कप कॉफ़ी .” , मजदूर ने जवाब दिया |
वेटर ने मजदूर से बिना पैसे लिए एक कप कॉफ़ी दी और दीवार पर लगी ढेर सारे कागज के टुकड़ों में से “एक कप कॉफ़ी ” लिखा एक टुकड़ा निकाल कर डस्टबिन में पफेंक दिया |
व्यक्ति को अब सारी बात समझ आ गयी थी |कसबे के लोगों का ज़रूरतमंदों के प्रति यह रवैया देखकर वह भाव- विभोर हो गया … उसे लगा , सचमुच लोगों ने मदद का कितना अच्छा तरीका निकाला है जहां एक गरीब मजदूर भी बिना अपना आत्मसम्मान कम किये एक अच्छी सी कॉफ़ी -शॉप में खाने -पीने का आनंद ले सकता है | अब वह कसबे की खुशहाली का कारण जान चुका था और इन्ही विचारों के साथ वापस अपने शहर लौट गया |

Story Source: पूज्य आचार्य

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Reason for the rebound

Japan Tokyo near the town was famous for its happiness a town | Once a person to learn the reason for the rebound of kasbe morning there came | Enter it in a coffee-shop do them. He mind mind thought I sit here looking up-arch people, and he gradually began moving inside the shops sat on a Chair can be |
Coffee-shop like the city’s restaurants, but there was some strange behavior of her people.
A man came into the shop and give two coffee money, stating, “two cups of coffee, one for me and one that wall.”
Person dekhnelga side of the wall but there is still no look not come after the guy in a coffee waiter went to the wall and put a piece of paper glued on it, on which was written “a cup of coffee”.
People do not understand that after all what all the commotion is about. He thought for a while and sits, and tries to understand |
A little later came a poor worker there, her clothes were torn-old but still he rammed in all over the shop with self-confidence and comfortably sat on a Chair |
Person wondering if a worker doing so on the money barvad for coffee is not wise.
Then the waiter take order to in helping labour. “Sir, please let your order!”, the waiter said.
“A cup of coffee from the wall.”, the worker replied.
Waiter gave a cup of coffee without money from workers and a whole lot of paper on the wall pieces “have a cup of coffee” in a piece written by removing the dustbin panic |
The whole point was to understand now | kasbe people seeing this attitude towards the zarurtamandon updated-vibhor done… It felt so nice way of help really pulled people where a poor worker at your self-esteem without even being a nice little coffee-shop can enjoy in food | Now he had the life and happiness of kasbe cause these “returned back to your city with ideas |

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