Home / Hindi / अनेक रोगों का मूल कारण: विरुद्ध आहार – The root cause of many diseases : Against Diet

अनेक रोगों का मूल कारण: विरुद्ध आहार – The root cause of many diseases : Against Diet

Against Diet

The root cause of many diseases : Against Diet

Anti dietary intake of force , intelligence , and age destroy semen , impotence , blindness , insanity , fistula-in-ano , Twchavikar , stomach disorders, inflammation , hemorrhoids , pyrosis ( acidity ) , white stain , sensory impairment and Ashtumahagd into eight types , ie incurable Ailments arise. Against the Grain intake can also cause death .

– The substance juice – Rktadi against metals Gundharmwale and Vata – Pitta – Kapha by these Tridoshon to provoke , their consumption is the genesis of diseases | Cross Gunviruddh some of these substances , some Snyogviruddh , some Snskarviruddh and some countries , time , volume , are against nature etc. | – such as milk, green gram , urad , gram, pulses etc , all kinds of citrus and sweet fruits , carrots , Skkand , potato , radish roots , such as , oil , molasses , honey , yogurt , coconut , garlic , Kmlnal , the saline and acid are Snyogvirud Pradartha | milk and should not take them together | between them is less – than – Remember to maintain a difference of less than 2 hours |

– Urad such as yogurt , molasses , pepper , banana and honey ; With honey, treacle ; Should not eat butter with oil |

– Honey , ghee , oil and water two or three of these four substances are harmful substances to treat Smbag |

– Hot and cold foods to eat together , the digestive fire and digestion is retarded |

– Yogurt and honey to warm up they become distorted |

– Created distort milk curd , cheese and fermented Pradartha ( eg – dosa , idli , Kmn ) Their use benefits that are by nature instead of against them is loss |

– Were grown by chemical fertilizers and Injeksn cereal and cooked vegetables and fruits by chemicals are also Swbavviruddh |

– Hemant and winter cold in the winter seasons , rugged – dried , Watwrdhk drug abuse , poor diet and spring – summer – autumn seasons in the tropical heat Pdarthan and yogurt is Kalviruddh |

– In the harsh desert , en: , sharp materials ( more peppers , hot spices etc.) and coastal regions smooth – cold foods intake , intake of saline ground water is Deshviruddh |

– By labor rugged individuals – dried , Watwrdhk substance and less food and sat – sat for individuals working smooth , sweet , Kfvrdhk foods and more food is Avsthaviruddh | – Adkchcha , over cooked , burnt , again and again been heated , cooked at high temperatures ( eg – making and fast food in the oven ) , placed in extreme cold temperatures ( eg – Firj canned foods ) diet is Pakviruddh |

– Feces , urine , without sacrifice , without hunger or appetite, eating too much is Kramviruddh |

– Which Diet is not liking the fire illuminated the Hradyviruddh not liking even if the diet is not due digestive |

– Thus , time , age , nature , culture , opinion and dietary intake etc. – Apthe discretion of the foods consumed by the continual Pthekr | Are you so ignorant spew against loss from a diet – the body of Panchakarma Virecnadi and other classical treatment should purify | operation and English Medicines root diseases – not original out | my cool and free of legal information Swarth Anv care was the special benefits of Panchakarma | eradicated only if the disease ; 10-14 years could raise lifemanship |

– Due to ignorance , add some milk to drink soda or Kolddrink | how heavy they have to go on the slavery of taste , it ‘s not the place to detail by describing | v diet is the parent of many diseases , they do not know | Nmkwala meal with rice pudding , porridge with cream , milkshakes – all against diet | Pashchaty world these children , youth , elderly victims of the disease are lots | so Buddhimano Hey ! Citrus – Do not eat salty cheeses with milk Forgetting – not Kilayen |

*****************

अनेक रोगों का मूल कारण: विरुद्ध आहार

विरोधी आहार के सेवन से बल, बुद्धि, वीर्य व आयु का नाश, नपुंसकता, अंधत्व, पागलपन, भगंदर, त्वचाविकार, पेट के रोग, सूजन, बवासीर, अम्लपित्त (एसीडिटी), सफेद दाग, ज्ञानेन्द्रियों में विकृति व अष्टौमहागद अर्थात् आठ प्रकार की असाध्य व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। विरुद्ध अन्न का सेवन मृत्यु का भी कारण हो सकता है।

– जो पदार्थ रस-रक्तादी धातुओं के विरुद्ध गुणधर्मवाले व वात-पित्त-कफ इन त्रिदोषों को प्रकुपित करनेवाले हैं, उनके सेवन से रोगों की उत्पत्ति होती है | इन पदार्थों में कुछ परस्पर गुणविरुद्ध, कुछ संयोगविरुद्ध, कुछ संस्कारविरुद्ध और कुछ देश, काल, मात्रा, स्वभाव आदि से विरुद्ध होते हैं | जैसे-दूध के साथ मूँग, उड़द, चना आदि सभी दालें, सभी प्रकार के खट्टे व मीठे फल, गाजर, शककंद, आलू, मूली जैसे कंदमूल, तेल, गुड़, शहद, दही, नारियल, लहसुन, कमलनाल, सभी नमकयुक्त व अम्लीय प्रदार्थ संयोगविरुध हैं | दूध व इनका सेवन एक साथ नहीं करना चाहिए | इनके बीच कम-से-कम २ घंटे का अंतर अवश्य रखें |

– ऐसे ही दही के साथ उड़द, गुड़, काली मिर्च, केला व शहद; शहद के साथ गुड़; घी के साथ तेल नहीं खाना चाहिए |

– शहद, घी, तेल व पानी इन चार द्रव्यों में से दो अथवा तीन द्रव्यों को समभाग मिलाकर खाना हानिकारक हैं |

– गर्म व ठंडे पदार्थों को एक साथ खाने से जठराग्नि व पाचनक्रिया मंद हो जाती है |

– दही व शहद को गर्म करने से वे विकृत बन जाते हैं |

– दूध को विकृत कर बनाया गया छेना, पनीर आदि व खमीरीकृत प्रदार्थ (जैसे-डोसा, इडली, खमण) स्वभाव से ही विरुद्ध हैं अर्थात इनके सेवन से लाभ की जगह हानि ही होती है |

– रासायनिक खाद व इंजेकशन द्वारा उगाये गये आनाज व सब्जियाँ तथा रसायनों द्वारा पकाये गये फल भी स्वभावविरुद्ध हैं |

– हेमंत व शिशिर इन शीत ऋतुओं में ठंडे, रुखे-सूखे, वातवर्धक पदार्थों का सेवन, अल्प आहार तथा वसंत-ग्रीष्म-शरद इन ऊष्ण ऋतुओं में ऊष्ण पदार्थं व दही का सेवन कालविरुद्ध है |

– मरुभूमि में रुक्ष, उषण, तीक्षण पदार्थों (अधिक मिर्च, गर्म मसाले आदि) व समुद्रतटीय प्रदेशों में चिकने-ठंडे पदार्थों का सेवन, क्षारयुक्त भूमि के जल का सेवन देशविरुद्ध है |

– अधिक परिश्रम करनेवाले व्यक्तियों के लिए रुखे-सूखे, वातवर्धक पदार्थ व कम भोजन तथा बैठे-बैठे काम करनेवाले व्यक्तियों के लिए चिकने, मीठे, कफवर्धक पदार्थ व अधिक भोजन अवस्थाविरुद्ध है | – अधकच्चा, अधिक पका हुआ, जला हुआ, बार-बार गर्म किया गया, उच्च तापमान पर पकाया गया (जैसे-ओवन में बना व फास्टफूड), अति शीत तापमान में रखा गया (जैसे-फिर्ज में रखे पदार्थ) भोजन पाकविरुद्ध है |

– मल, मूत्र का त्याग किये बिना, भूख के बिना अथवा बहुत अधिक भूख लगने पर भोजन करना क्रमविरुद्ध है |

– जो आहार मनोनुकूल न हो वह ह्रदयविरुद्ध है क्योंकि अग्नि प्रदीप्त होने पर भी आहार मनोनुकूल न हो तो सम्यक पाचन नहीं होता |

– इस प्रकार देश, काल, उम्र, प्रकृति, संस्कार, मात्रा आदि का विचार तथा पथ्य-अपथ्य का विवेक करके नित्य पथ्यकर पदार्थों का ही सेवन करें | अज्ञानवश विरुद्ध आहार के सेवन से हानि हो गयी हो तो वमन-विरेचनादी पंचकर्म से शारीर की शुद्धी एंव अन्य शास्त्रोक्त उपचार करने चाहिए | आपरेशन व अंग्रेजी दवाएँ रोगों को जड़-मूल से नहीं निकालते | अपना संयम और नि:सवार्थ एंव जानकार वैध की देख-रेख में किया गया पंचकर्म विशेष लाभ देता है | इससे रोग तो मिटते ही हैं, १०-१४ वर्ष आयुष्य भी बढ़ सकता है |

– नासमझी के कारण कुछ लोग दूध में सोडा या कोल्डड्रिंक डालकर पीते हैं | यह स्वाद की गुलामी आगे चलकर उन्हें कितनी भारी पड़ती है, इसका वर्णन करके विस्तार करने की जगह यहाँ नहीं है | विरुद्ध आहार कितनी बिमारियों का जनक है, उन्हें पता नहीं | खीर के साथ नमकवाला भोजन, खिचड़ी के साथ आइसक्रीम, मिल्कशेक – ये सब विरुद्ध आहार हैं | इनसे पाशचात्य जगत के बाल, युवा, वृद्ध सभी बहुत सारी बिमारियों के शिकार बन रहे हैं | अत: हे बुद्धिमानो ! खट्टे-खारे के साथ भूलकर भी दूध की चीज न खायें- न खिलायें |

  Story Source: पूज्य आचार्य

Down

About Mohammad Daeizadeh

  • تمامی فایل ها قبل از قرار گیری در سایت تست شده اند.لطفا در صورت بروز هرگونه مشکل از طریق نظرات مارا مطلع سازید.
  • پسورد تمامی فایل های موجود در سایت www.parsseh.com می باشد.(تمامی حروف را می بایست کوچک وارد کنید)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*


*