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What kind of help – यह कैसी मदद

What kind of help

What kind of help ? Lives are ruined and met only 2 rupees

Rudraprayag , [ Ajay Khantwal ] . Two brothers and nine family members . Roof over the head and not to haul pots on the stove . Pindar has swept all the rage . The government has two brothers – two thousand rupees relief. Somehow a few days under the open sky with the help of two stones hearth burn , but what will happen now . The Dimmr village Harish and lamp life seems to be a burden .

June 17 Pindar River along the hammock is common sight in the township . Harish and lamp house was in the same township . Harish Raj Mistry , while the cost of the house was running lamps wages .

Indeed , the strong currents Pindar came to a boulder toppled a wall of the house . Three rooms in the house and headed for the river and the house was thrown into the river .

Patwari take to improve the administration reached the spot and two brothers – one tent and two – two thousand rupees was handed back . Two weeks passed, but again “government” has not looked the part . Now is spent on material received from donors . Slowly it is being reduced . Burning stove is bound to be difficult .

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यह कैसी मदद ? जिंदगी तबाह हो गई और मिले सिर्फ 2 हजार रुपये

रुद्रप्रयाग, [अजय खंतवाल]। दो भाई और नौ सदस्यों का परिवार। न सिर पर छत और न चूल्हे पर चढ़ाने के लिए बर्तन। पिंडर का क्रोध सब कुछ लील गया। सरकार ने दोनों भाइयों को दो-दो हजार रुपये की राहत दी। किसी तरह खुले आसमान के नीचे दो पत्थरों के सहारे कुछ दिन चूल्हा जला, लेकिन अब क्या होगा। ऐसे में डिम्मर गांव के हरीश व दीपक को अपना जीवन बोझ लगने लगा है।

17 जून से पिंडर नदी से लगी झूला बस्ती में यह नजारा आम है। हरीश और दीपक का घर इसी बस्ती में था। हरीश राज मिस्त्री है, जबकि दीपक मजदूरी कर घर का खर्चा चलाते थे। हरीश बताते हैं 17 जून की सुबह करीब आठ बजे तक पूरा परिवार हंसी-खुशी जीवन बसर कर रहा था, तभी अचानक नदी के तेज बहाव में आया एक बड़ा पत्थर मकान से टकराया और देखते ही देखते दोनों भाईयों के जीवन की राह कंटीली हो गई।

दरअसल, पिंडर के तेज बहाव में आए एक बोल्डर ने मकान की एक दीवार गिरा दी। नदी ने भी मकान का रुख किया और तीन कमरों का यह मकान नदी में समा गया।

सुध लेने प्रशासन की ओर से पटवारी मौके पर पहुंचा व दोनों भाइयों को एक-एक टैंट व दो-दो हजार रुपये थमा वापस लौट गया। दो सप्ताह बीत गए, लेकिन दोबारा ‘सरकार’ इस ओर झांकने नहीं आए। अब गुजारा दानदाताओं से मिली सामाग्री पर हो रहा है। धीरे-धीरे इसमें भी कमी आती जा रही है। चूल्हा जलाना मुश्किल होना लाजिमी है।

Story Source: पूज्य आचार्य

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