Home / Hindi / मन की आवाज – Inner Voice

मन की आवाज – Inner Voice

Inner Voice

 

Inner Voice
The old woman was going to be a big bundle . Cursorily he was tired . Then he noticed that there have mounted . The old woman watching her voice , ” Hey son , hear a thing . ” Horseman stopped . He asked , ‘ What is it Mai? ”
The old woman said, ” Son, I have to go into the village opposite him . I am very tired . This parcel is not picked up . You are probably being over . Put it Wrapper horse . I will run smoothly . ”
The man said , “My foot is you . I ‘m on a horse . The village is far away . I do not know how long you will reach there . I will arrive shortly . When they arrived , waiting thy will? ” He’s saying .
After a few minutes he said to myself , ‘You are such a fool . He is old , can not walk properly . He gives what may or may not appear properly . Bale was giving you . It is possible that a bundle
Be valuables . Who asks if you took him away . Running back , Bale take . ”
He came back and turned the old woman said , “My , bringing their bundle . I ‘ll take you. Your path will look to stay in the village . ”
The old woman said , ‘nor the Son , are you now , I do not pay a bundle . ”
Mounted “It was just saying that if you take a walk . When the bale is not ready to give up now running . Why ? Who do you explain this paradoxical ? ‘
A smiling old woman said, ‘ He who explained that Mai bundle you explained it to him. If you sat in the same sitting in me . He bale to take you away . He explained to me that the bundle does not , then he will not . Hast heard , and I heard his heart . “

*********************

 मन की आवाज
एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’
बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है।यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’
उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा।
कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई
कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘
वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’
बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’
घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’
बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।

Story Source: पूज्य आचार्य

Down

About Mohammad Daeizadeh

  • تمامی فایل ها قبل از قرار گیری در سایت تست شده اند.لطفا در صورت بروز هرگونه مشکل از طریق نظرات مارا مطلع سازید.
  • پسورد تمامی فایل های موجود در سایت www.parsseh.com می باشد.(تمامی حروف را می بایست کوچک وارد کنید)
  • Password = www.parsseh.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

*